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May 14, 2013 · 35 Comments1984 – ए रोड स्टोरी
1984 – ए रोड स्टोरी
इस बार मई माह में गाँव जाना हुया एकदम अकेले. मार्च में चचेरी बहन के विवाह पर देश-विदेश से इकट्ठा हुए कुनबे वालों की गहमागहमी के बाद, मेरे सबसे छोटे चाचा का घर सुनसान पड़ा था. इधर, हमारे घर का ताला ही ... Continue Reading →
तू जहाँ जहाँ चलेगा, मेरा साया साथ होगा…
मेरा पिछला यात्रा संस्मरण पढ़ते पढ़ते एक पाठक की जिज्ञासा केवल कुछ शब्दों तक सीमित रहीं. …11 उपग्रहों से जुड़ चुके जीपीएस नेविगेटर …सेटेलाईट आधारित पथप्रदर्शक जैसे शब्दों ने उन्हें उलझा कर रख ... Continue Reading →
सपने में दिखी जगह पर पहुँच गए अचानक
दशकों से साथ रहे मेरे एक मित्र अक्सर कहते हैं कि दुनिया में जो अनोखा होता है तेरे साथ ही होता है. और कई बातों को उनहोंने सामने रख कर अपने कथन को सही साबित किया. ऐसा ही कुछ इस बार भी हुया.
पिछले सप्ताह ... Continue Reading →
एंड्रायड आधारित मोबाईल क्यों लिया…
पिछले लेख में जब मैंने लिखा कि एंड्रायड फोन के खो जाने पर किस तरह एक एप्लीकेशन की सहायता से फोन वापस पाया जा सकता है, नियंत्रित किया जा सकता है, तो इधर दिनेशराय द्विवेदी जी की साँसे ऊँची नीची हो गईँ. ... Continue Reading →
…और एंड्रायड खो जाए!
दो दिन पहले बातों ही बातों में तीसरा खंबा के संचालक दिनेशराय द्विवेदी जी ने जानकारी दी कि उनके पास भी अब एंड्रायड आधारित फोन आ गया है जिसे समझने की कोशिश में हैं वे.
वे बता ही रहे थे कि कितने ही फीचर्स ... Continue Reading →
क्या वो फिर आयेगा? इस सवाल का ज़वाब तो समय देगा
एक समय ऐसा था जब प्रसिद्ध भारतीय भौतिकीय वैज्ञानिक जयन्त विष्णु नार्लीकर की धूमकेतु, वामन की वापसी जैसी पुस्तकें पढ़ कर मैं सोचने लग गया कि यह भगवान वगैरह नाम की चीज और कुछ नहीं बस निश्चित तौर पर ... Continue Reading →
जीना यहाँ मरना यहाँ
हिंदी फिल्मों के महान पार्श्व गायकों में से एक (स्वर्गीय) मुकेश द्वारा गाये गए गीत मुझे हमेशा ही पसंद आये हैं. इन सब में भी मेरा सबसे पसंदीदा गीत है “…जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ…“
इंटरनेट ... Continue Reading →
बुजुर्गों, महिलाओं के लिए एक बढ़िया मोबाईल हैंडसेट
तेजी से बदलते सामाजिक ढाँचे और एकल परिवार के प्रचलन के बीच किसी भी समस्या के निदान के लिए अब तकनीक का मुंह ताका जाना सामान्य बात हो चली है. परिवार में कोई वरिष्ठ नागरिक हो तो समस्या के निदान की ओर ... Continue Reading →
दीवारों से बात करता मैं दीवाना
बचपन से सुनते-पढ़ते आया हूँ कि जब दो व्यक्ति बात कर रहे हों और उनमें से एक व्यक्ति दूसरे की कतई न सुने, तो दूसरा कहता है, ‘क्या मैं दीवारों से बात कर रहा हूं?’ या फिर किसी कमरे में कोई अकेले ही अपने आप ... Continue Reading →
गूगल ग्लास से देखी जाये अब दुनिया
टर्मिनेटर श्रंखला की फिल्मों में मुख्य पात्र की भूमिका निभाते अर्नाल्ड श्वाजनेगर हमेशा एक ऐसा चश्मा पहने रहते हैं, जो फ़िल्म के कथानक में एक कंप्यूटर है.
वह मशीनी मानव अपने चश्मे की सहायता से जिस ... Continue Reading →
डेटॉल के गरारे !
आज संध्या, फेसबुक पर डॉ आराधना चतुर्वेदी की गले में इन्फेक्शन वाली समस्या बताता एक स्टेट्स अपडेट देखा तो मुझे कई वर्षों पहले हुया एक दिलचस्प वाकया याद आ गया!
ऐसे ही एक दिन गले में संक्रमण संबंधित ... Continue Reading →
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी, हैरान हूँ मैं
25 मई 1986 की उस आधी रात को मैं अकेला, उस सुनसान लॉबी में धड़कते दिल के साथ दीवार से सट कर खड़ा था जिसमे एक ऑपरेशन थियेटर के भीतर हमारे अंश से पनपी नई जिंदगियों को इस दुनिया में लाये जाने की डॉक्टरी कोशिश ... Continue Reading →








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